श्री राधा चालीसा || Shree Radha Chalisa Lyrics in Hindi

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राधा – प्रेम की प्रतीक

राधा हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण की सबसे प्रिय और अनन्य भक्त मानी जाती हैं। वे वृंदावन की गोपियों में सबसे प्रमुख हैं और कृष्ण की प्रेमिका के रूप में प्रसिद्ध हैं। राधा और कृष्ण का प्रेम दिव्य और आध्यात्मिक प्रेम का प्रतीक है, जो भक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा को दर्शाता है।

राधा को “राधिका” या “राधारानी” के नाम से भी पुकारा जाता है। उनका जन्म बरसाना में हुआ माना जाता है, जो मथुरा के पास स्थित है। राधा और कृष्ण की लीलाएं भक्ति साहित्य, कविताओं और संगीत में विस्तार से वर्णित हैं। उनका प्रेम मानवीय संबंधों से ऊपर उठकर आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। राधा की भक्ति इतनी शुद्ध और निस्वार्थ है कि उन्हें भक्ति की अवतार माना जाता है। उनकी कृपा से भक्तों को प्रेम, भक्ति और आनंद की प्राप्ति होती है।

राधा-कृष्ण की पूजा विशेष रूप से होली और जन्माष्टमी के अवसर पर की जाती है। उनकी कथा भक्तों को प्रेम और समर्पण का संदेश देती है।

दोहा

श्री राधे वुषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार ।
वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रानावौ बारम्बार ॥

जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिय सुखधाम ।
चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम ॥

चौपाई

जय वृषभान कुंवारी श्री श्यामा ।
कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥१॥

नित्य विहारिणी श्याम अधर ।
अमित बोध मंगल दातार ॥२॥

रास विहारिणी रस विस्तारिन ।
सहचरी सुभाग यूथ मन भावनी ॥३॥

नित्य किशोरी राधा गोरी ।
श्याम प्रन्नाधन अति जिया भोरी ॥४॥

करुना सागरी हिय उमंगिनी ।
ललितादिक सखियाँ की संगनी ॥५॥

दिनकर कन्या कूल विहारिणी ।
कृष्ण प्रण प्रिय हिय हुल्सवानी ॥६॥

नित्य श्याम तुम्हारो गुण गावें ।
श्री राधा राधा कही हर्शवाहीं ॥७॥

मुरली में नित नाम उचारें ।
तुम कारण लीला वपु धरें ॥८॥

प्रेमा स्वरूपिणी अति सुकुमारी ।
श्याम प्रिय वृषभानु दुलारी ॥९॥

नवल किशोरी अति छवि लगै धामा ।
द्युति लघु लाग कोटि रति कामा ॥१०॥

गौरांगी शशि निंदक वदना ।
सुभाग चपल अनियारे नैना ॥११॥

जावक युत पद पंकज चरण ।
नूपुर ध्वनि प्रीतम मन हारना ॥१२॥

सन्तता सहचरी सेवा करहीं ।
महा मोद मंगल मन भरहीं ॥१३॥

रसिकन जीवन प्रण अधर ।
राधा नाम सकल सुख सारा ॥१४॥

अगम अगोचर नित्य स्वरूप ।
ध्यान धरत निशिदिन ब्रजभूपा ॥१५॥

उप्जेऊ जासु अंश गुण खानी ।
कोटिन उमा राम ब्रह्मणि ॥१६॥

नित्य धाम गोलोक बिहारिनी ।
जन रक्षक दुःख दोष नासवानी ॥१७॥

शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।
पार न पायं शेष अरु शरद ॥१८॥

राधा शुभ गुण रूप उजारी ।
निरखि प्रसन हॉट बनवारी ॥१९॥

ब्रज जीवन धन राधा रानी ।
महिमा अमित न जय बखानी ॥२०॥

प्रीतम संग दिए गल बाहीं ।
बिहारता नित वृन्दावन माहीं ॥२१॥

राधा कृष्ण कृष्ण कहै राधा ।
एक रूप दौऊ -प्रीती अगाधा ॥२२॥

श्री राधा मोहन मन हरनी ।
जन सुख प्रदा प्रफुल्लित बदनी ॥२३॥

कोटिक रूप धरे नन्द नंदा ।
दरश करन हित गोकुल चंदा ॥२४॥

रास केलि कर तुम्हें रिझावें ।
मान करो जब अति दुःख पावें ॥२५॥

प्रफ्फुल्लित होठ दरश जब पावें ।
विविध भांति नित विनय सुनावें ॥२६॥

वृन्दरंन्य विहारिन्नी श्यामा ।
नाम लेथ पूरण सब कामा ॥२७॥

कोटिन यज्ञ तपस्या करुहू ।
विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥२८॥

तऊ न श्याम भक्तही अहनावें ।
जब लगी राधा नाम न गावें ॥२९॥

वृंदा विपिन स्वामिनी राधा ।
लीला वपु तब अमित अगाधा ॥३०॥

स्वयं कृष्ण पावै नहीं पारा ।
और तुम्हें को जानन हारा ॥३१॥

श्रीराधा रस प्रीति अभेदा।
सादर गान करत नित वेदा ॥३२॥

राधा त्यागी कृष्ण को भाजिहैं ।
ते सपनेहूं जग जलधि न तरिहैं ॥३३॥

कीरति कुमारी हूँवारी राधा ।
सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥३४॥

नाम अमंगल मूल नसावन ।
त्रिविध ताप हर हरी मन भवानी ॥३५॥

राधा नाम ले जो कोई ।
सहजही दामोदर वश होई ॥३६॥

राधा नाम परम सुखदायी ।
भजतहिं कृपा करें यदुराई ॥३७॥

यशुमति नंदन पीछे फिरेहै।
जो कौउ राधा नाम सुमिरिहै ॥३८॥

रास विहारिनी श्यामा प्यारी ।
करुहू कृपा बरसाने वारि ॥३९॥

वृन्दावन है शरण तुम्हारी ।
जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥४०॥

दोहा

श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम ।
करहूँ निरंतर बास मै, श्री वृन्दावन धाम ॥

॥ इति श्री राधा चालीसा ॥

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